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Saturday, October 11, 2008

धर्म परिवर्तन से बचने का उपाय

इस धर्म परिवतन को लेकर ना जानें कितने झगड़े व खून खराबा आए दिन होता रहता है।आज यह साबित करना मुश्किल होता जा रहा है कि लोग अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन करते हैं या फिर किसी लालच या भय के कारण वह इस ओर जाते हैं।हमारा इतिहास बताता है कि हिन्दू धर्म पर यह हमला आज से नही बहुत पुरानें समय से हो रहा है।जब देश मे मुगल राज्य की स्थापना हुई थी उस समय भी कई ऐसे शासक थे जो हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया करते थे।इतिहास इस का गवाह है।

लेकिन उस के बाद ईसाईयों ने इस काम को संभाल लिआ। आज जो धर्म परिवर्तन हो रहे हैं, वह स्वैछा से बहुत कम हैं। लेकिन गरीबी व अपमानित जीवन से मुक्ति पानें के लिए ज्यादा हो रहे हैं।इस के पीछे लालच व सुविधाओं का लोभ रूपी दाना डाला जा रहा है।जिस में गरीब हिन्दु आसानी में फाँसा जा रहा है। समझ नही आता कि इस तरह धरम परिवर्तन कराने मे उन्हें क्या फायदा होता है? यदि वह बिना धर्म परिवर्तन कराए ही उन को वही सुविधाएं प्रदान कर दे और धर्म परिवर्तन के लिए कोई दबाव ना डाले तो क्या इस तरह कार्य या सेवा करनें से उन के ईसा मसीह उन से नाराज हो जाएगें ?

यहाँ स्पस्ट करना चाहुँगा कि यह लेख किसी धर्म की निंदा करने के लिए नही लिखा जा रहा।इसे लिखने का कारण मात्र इतना है कि जो अपने धर्म के अनुयायीओं की सख्या बढाने के चक्कर में दुसरों को लालच या भय के द्वारा भ्रष्ट करते हैं, उन्हें रोका जा सके। उन के द्वारा किए गए ऐसे कार्य कुछ लोगो को उकसानें का कारण बन जाते हैं जिस से देश में रक्तपात व आगजनी की शर्मनाक घटनाएं होती रहती हैं।इन सभी को रोका जा सके।

लेकिन इस धर्म परिवर्तन के पीछे मात्र ईसाई ही एक कारण नही हैं।इस के पीछे हमारी दलितो और गरीबों के प्रति हमारी मानसिकता भी एक कारण है। आज भी दलितो को कोई पास नही बैठनें देता।भले ही शहरों में यह सब कुछ नजर नही आता ,लेकिन गाँवों में यह आज भी हर जगह दिखाई पड़ता है।आप किसी भी गाँव में चले जाए। वही आप को दलितों को कदम कदम पर अपमान का घूट पीते देखा जा सकता है।ऊची जातियो द्वारा दिया गया यही अपमान उन्हें धर्म परिवर्तन की ओर ले जा रहा है।लोगो का ऐसा व्यवाहर भी इस धर्म परिवर्तन का एक कारण हो सकता है। इस लिए यदि हमें इस धर्म परिवर्तन को रोकना है तो सब से पहले इस निम्न वर्ग कहे जानें वालो के मन से छोटेपन का एहसास हटाना होगा।उन्हें अपने साथ बराबरी का दर्जा देना होगा। उसे कदम कदम पर अपमानित होनें के कारणो को दूर करना होगा।इस के लिए ईसाईयो के घर जलाने की नही, किसी को मारने की नही है। बल्कि अपने भीतर बनी ऊँच-नीच की दिवार गिरानी होगी,अपने भीतर के इन कुसंस्कारों को जलाना होगा। यदि हम उन दलित्व पिछड़े कहे जानें वालों को बराबरी का हक दे देगें ,तो फिर कोई लालच उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए, उकसाने मे सफल नही हो सकता।लेकिन क्या शोर मचानें वाले लोग इस कार्य को व्यवाहरिक रूप में ला सकते हैं? यदि ला सकते हैं तो बहुत हद तक इस धर्म परिवर्तन की समस्या से बचने का समाधान हो जाएगा।

यदि फिर भी धर्म परिवर्तन की समस्या का समाधान नही होता तो आप को हाल में ही घटी एक घटना के बारे में बताता हूँ जो मैनें किसी अपनें खास से सुनी थी।यह घटना बिल्कुल सच्ची है।

कुछ समय पहले एक पढा लिखा सिख नौजवान दिल्ली नौकरी की तलाश में आया था।लेकिन काफि कोशिश करनें के बाद भी उसे नौकरी नही मिल पा रही थी।इसी तलाश में उस के फाँके काटने की नौबत आ गई थी।लेकिन इसी बीच संयोग से उन का संम्पर्क एक विशेष संप्रदाय के विशिष्ट व्यक्ति से हो गया।खाली होनें के कारण वह सिख नौजवान उन के साथ उन के धार्मिक सस्थान में भी आने जानें लगा\ उन महाश्य को मालुम था कि यह एक जरूरत मंद है सो उसे अपनें धर्म में लानें के लिए उस पर जोर डालने लगे।उस नौजवान ने अपनी सारी समस्या उन के सामने रख दी कि पैसा धेला मेरे व मेरे घर वालों के पास नही है।नौकरी मिल नही रही।बिजनैस करने के धन नही है।शादी की उमर भी निकलती जा रही है।यदि आप मेरी मदद करें तो में आप के धर्म को अपना लूँगा।बस फिर क्या था। कुछ ही दिनों के बाद उसकी शादी हो गई।दिल्ली मे ही एक घर अच्छी खासी सिक्योरटी दे कर किराए पर एक घर दिला दिया गया।नौकरी तो नही मिली लेकिन उसे नया थ्रीव्हीलर दिला दिया गया।वह सिख धर्म बदल कर कुछ साल तक दिल्ली मे ही रहा।लेकिन एक दिन अचानक सब कुछ बेच कर,घर के लिए दी गई सिक्योरटी ले,,अपनी पत्नी को लेकर वापिस अपने गाँव लौट गया।वहाँ पहुच कर उस ने पुन: स्वयं व अपनी पत्नी को भी सिख धर्म मे ले आया।आज वह उसी धन से छोटा-सा बिजनैस कर रहा है और मजे से रह रहा है।जिन महाशय ने उन का धर्म परिवर्तन कराया था वे आज अपना सिर धुन रहे हैं।मैं सोचता हूँ कि यदि ऐसा ही रास्ता अपना कर इन लालच देकर धर्म परिवतन करवाने वालों को सबक सिखाया जाए तो वह भी आगे से किसी को लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाने से शर्मसार होगें।

Thursday, November 8, 2007

करीम मुक्त हो --क्या विरोध का यह तरीका जायज है?



मेरे विचार से हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गलत मतलब निकाल रहें हैं। कल से एक पोस्ट पर यह आग्रह किया जा रहा है कि आप करीम जी,के समर्थन में वहाँ की सरकार का विरोध करें। उन की बात जायज है...लेकिन जहाँ तक मेरे व्यक्तिगत विचार हैं कि विरोध करनें के लिए किसी को किसी के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करना गलत बात है...इस से उस धर्म को माननें वालों को बहुत ठेस पहुँचती है। जिस कारण धार्मिक उद्दमाद भड़कनें की ही संम्भावना अधिक रहती है।..इस से कट्टरवादियों को सीधे-साधे लोगों को भड़काने का ही अवसर भी हम प्रदान कर देते हैं। जो बहुत खतरनाक व भयानक होता है। क्यूँ कि करीम जी स्वयं एक मुसलमान हैं...यदि उन्हें इस्लाम में कुछ खामियां नजर आती हैं तो वह किसी दूसरे धर्म को अपना कर अपना विरोध दरज करा सकते थे। क्यूँ कि सब को अपने ढंग से चलाना मुश्किल ही नही..नामुम्किन भी है।....यदि हम इन धार्मिक विरोधों को जायज ठहराते हैं तो फिर हिन्दू,सिख,ईसाई या किसी भी धर्म के धार्मिक मामलों को भी हमें जायज ठहराना होगा। ऐसा करनें पर कैसे बखेड़े खड़े होगें....यह बतानें की जरूरत नही है...सभी समझ सकते हैं।

शायद मेरे विचार पढ़्नें के बाद कुछ लोग तर्क दे कि समाज के प्रति हमारा कुछ फर्ज बनता है ..सो हम समाज को सही दिशा देना चाहते हैं।....उन से कहना चाहूँगा कि वे समाज को सही दिशा अवश्य दे...लेकिन धर्म से ट्क्कर लेकर खोखली पब्लिसीटी लूटने की बजाए..अपनें आप को ही बदल कर विरोध करना आरंभ करें जिस से समाज की व धर्म की बुराईयां( जैसा के मेरे कुछ भाईयों को नजर आती हैं) अपने आप धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।

किसी ने कहा है--

जो अच्छा लगे
उसे अपना लो
जो बुरा लगे उसे जानें दो
हरिक बात के मानें दो।

मेरे विचारों से यदि कोई आहत होता है तो मैं क्षमा चाहूँगा। यहाँ मैनें मात्र अपनी व्यक्तिगत राय आप के समक्ष रखी है। मैं यह नही चाहता कि आप मेरी बात को मान ही लें। यदि आप को मेरी बात सही लगती है तो उसे अपनाएं, यदि बुरी लगती है तो उसे मेरी कही बातों को भूल जाएं।

हाँ एक बात अवश्य कहूँगा---करीम भाई को क्षमादान अवश्य मिलना चाहिए।

अंत मैं मेरी और से सभी चिट्ठाकारों को दिपावली की बहुत-बहुत बधाई!!!